जे राखे रघुबीर, ते उबरे तेहिं काल महु……!!!!!

रामनवमी के पुण्य अवसर पर पूज्य गुरुदेव द्वारा अमूल्य आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन।
जे राखे रघुबीर, ते उबरे तेहिं काल महु……!!!!!
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इहां देव ऋषि गरुड़ पठायो ।
राम समीप सपदि सो आयो ।।
दो :- खगपति सब धरि खाए, माया नाग बरूथ।
माया विगत भए सब, हरषे वानर जूथ।।
गरुड को भेज दिया नारद ने। नारद कहते हैं आकाश को। साधक की नाभि में – इस नभ में वाणी मिली , अंतर्जगत से ईश्वरीय संकेत हो गया । उपाय हो गया। गरुड़ आ गया। गरुड़ कहते हैं जीते हए मन को। गरुड़ कोई चिडि़या नहीं है ।
जानकारी होने से , इष्ट की अनुकूलता से , साधक को अन्दर ही अन्दर संकेत मिल जाता है , तो मन जो विषय से भर गया था , वह उस काम वासना से मुक्त होकर ईश्वरीय भावना से युक्त हुआ। मन सर्प से गरुड बन गया। जो विषय के संकल्यो का जाल बुन रहा था बन्द हो गया – ईश्वरीय संकल्प वाला मन हो गया। यह गरुड़ जब बन गया , तो विषय के संकल्प शान्त हो गए। विषय के संकल्परूपी सर्पों को खा गया गरुड़। मन की ऐसी यह प्रक्रिया है , जो बाहर घटना के रूप में दिखाई गई है। क्षण क्षण में मन बदलता रहता है। विषय में जाता है , तो सर्प कहा जाता है – ईश्वरीय भावनाओं में बहता है तो गरुड़ कहा जाता है, हंस कहा जाता है-
पहले यह मन सर्प था , करता जीवन घात ।
अब तो मन हंसा भया , मोती चुन चुन खात ।।
तो अब समाज के लोगों में राम का नागपाश में बंध जाना एक बड़ा प्रश्न बन जाता है । भगवान जो बंधन से परे है , असीम है , गुणातीत है , प्रकृतिपार है , वह बंधन में कैसे आ गया ? मेघनाद ने नागपाश में डाल दिया – यह कैसे संभव है ? गरुड़ को इसी प्रश्न ने परेशान कर दिया था । इसमें समझने की बात यह है कि भगवान कोई आदमी नहीं है – न कोई पदार्थ है । वह तो आकाशवत निर्लेप है । आकार रहित है । ऐसा जो तत्व है , सबके अन्दर आत्मा के रूप में है । ‘आत्मा नाम की शरीर के अन्दर कोई अलौकिक चीज है । वह परमात्मा ही माया से आच्छादित होकर जीवात्मा कहा जाता है । वह बोल रहा है अन्दर से ।
वह परमात्मा , जीवात्मा रूप से सबके अन्दर माया के वशीभूत होते हुए भी , तत्वतः निर्लेप है । वह बंधते हए भी बंधता नहीं , चलते हुए चलता नहीं , बोलते हुए । बोलता नहीं । ऐसा जो भगवान है , वह – कैसे नागपाश में बंध गया और गरुड के छुड़ाने से छूटा। जो खुद अपने को नहीं छुड़ा पाया तो दूसरे को क्या छुड़ाएगा ? तो यह सब भगवान कुछ नहीं करता – न बंधता है न बांधता है , न छूटता है न छुड़ाता है । वह तो ज्यों का त्यों है स्तंभवत । उसकी माया का सब खेल है । मनुष्य का मन एक विचित्र उपकरण है । शास्त्र कहता है-
‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षायोः।
बंधाय विषयासक्तं , मुक्त्यैर्निर्विषयस्मृतम् ।। ‘
यह मन जब माया उन्मुख होता है तो बांधने वाला बन जाता है । विषयोन्मुख होकर नागपाश बनजाता है । यही मन निर्विषय होकर ईश्वरोन्मुख होता है तो गरुड बन कर बंधन काट देता है – मोक्ष दिला देता है । तो यह सब साधनात्मक बातें हैं । उच्च स्तर की बातें हैं । बुद्धि लगाकर समझना पड़ेगा । मानस में अवगाहन करना पड़ेगा ।
इहां विभीषन मंत्र विचारा ।
सुनहु नाथ बल अतुल उदारा । ।
मेघनाद मख करइ अपावन ।
खल मायावी देव सतावन । ।
जौ प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि ।
नाथ वेगि पुनि जीति न जाइहि । ।
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना ।
बोले अंगदादि कपि नाना । ।
लछिमन संग जाहु सब भाई ।
करहु विधंस जग्य कर जाई । ।
जामवंत ने मेघनाद को मूर्छित करके लंका में फेंका । जब उसको होश हआ तो रावण को वहां देखकर उसे लाज लगी । क्योंकि खूब डींग हांक रहा था कि- ‘देखेहु कालि मोरि मनुसाई’ और खुद ही हार खा गया । तो जाकर एक पहाड़ की गुफा में निकुंभला देवी की आराधना करने लगा। अपावन यज्ञ करने लगा । निकुंभला देवी का मतलब स्त्री की इंद्रिय (योनि) से है। यह कामरूपी मेघनाद की इष्ट देवी है । कामावेशित पुरुष को वही अभीष्ट होता है । उसी का यजन – भजन होने लगा । लेकिन यह अपावन यज्ञ यदि पूरा हुआ – अगर स्त्री संसर्ग हो गया एक बार – तो फिर कामदेव को कोई जीत नहीं सकता । फिर साधक सदा के लिए पतित हो जाता है। कामवासना को जीत नहीं पाएगा । इसलिए यह अपावन यज्ञ हो न पाए अर्थात साधक को संभलना चाहिए । तो भगवान संभालते हैं , तभी संभल सकता है ।
‘जे राखे रघुबीर, ते उबरे तेहि काल महुँ ।’
तो विभीषण ने बताया राम से , कि ऐसा होने वाला है । यह विभीषण कैसे जान गया वहां की बात ? विचार करने की बात है । इसलिए यह यहां – वहां की बात नहीं है । यह साधक के अन्दर क्रिया चल रही है । साधक के अन्तर्जगत में ऐसे तो काम का प्रभाव मन में नहीं रहा – नागपाश कट चुका । लेकिन अभी यह काम रूपी मेघनाद मरा नहीं है । वह चुपचाप गुफा में निकुंभला की पूजा कर रहा है । मतलब काम विषयक आसक्ति गहराई में छिपकर बैठी है । चित्त के अन्तराल में अस्पष्ट रूप से कामदेव अपना काम कर रहा है । साधक को भरोसा हो जाता है कि मैने काम वासना को मन से निकालने में सफलता प्राप्त कर ली है । लेकिन वह गहराई में छिपा है – मौका पाकर पटक देगा । जैसे नारद को पटक दिया था । लेकिन भगवान रक्षा करते हैं , तो बचत हो जाती है। भगवान हमारे अन्दर बैठे है , जीवात्मा के रूप में । अन्तःकरण की गतिविधियों के द्रष्टा हैं । साधक को समय – समय पर आत्मा से संकेत मिलते हैं। अच्छे साधक उन संकेतो को पकड़ लेते हैं, और सुधार करते चलते हैं।
जीवात्मा है विभीषण , वह सब जानता है । वही बताता है । जब अन्दर से आत्मिका संकेत मिल गया , तो साधक सचेष्ट होकर लग गया । विवेक – लक्ष्मण , सुरति -सुग्रीव , अनुराग – अंगद सबकी मदद ले लिया । और अब कामरूपी मेघनाद को सदा – सदा के लिए समाप्त कर दिया जाएगा । साधना करने वाले साधक को ऐसे ढंग से अर्थ लेना चाहिए । क्योंकि बाहर की दुनिया से उसका लेना – देना रहता नहीं । वह तो अन्तर्मुखी हो चुका है । बाहर से आंख मूंद लिया है , इसलिए अन्दर देखना है । यही सही अर्थ है । अन्यथा गोस्वामी जी इसका नाम ‘ रामचरित मानस ‘ क्यों रखते ? ईश्वर के भजन में जिसका मन लगा है , उसका मन है मानस ।
~स्वामी अड़गड़ानन्द जी परमहंस।©
विनम्र शुभकामनाओं सहित,
~मृत्युञ्जयानन्द।
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