प्रभु श्री राम का आध्यात्मिक स्वरूप…….!!!!!

प्रभु श्री राम का आध्यात्मिक स्वरूप।।
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अंतःकरण में प्रस्फुटित अनुभवगम्य अनुभूति का एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण।।
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सती पार्वती की भी यही जिज्ञासा थी। उनका एक जन्म तो संशय में चला गया कि नर-तन धारण करनेवाले राम भगवान कैसे हो सकते हैं? दूसरे जन्म में उन्होंने अथक परिश्रम किया, घोर तपस्या की, भगवान शंकर को पुनः प्राप्त किया और तत्पश्चात् सत्संग आरम्भ हुआ। पिछले जन्म में प्रश्न जहाँ से छूटा था, सत्संग वहीं से प्रारम्भ हुआ। शैलजा ने प्रश्न रखा कि, राम भूप-सुत कैसे हुए? राम का स्वरूप क्या है? नर भगवान कैसे हो सकता है? शंकरजी ने पहले तो बहुत डाँटा, बोले-
कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाखंडी हरि पद बिमुख, जानहिं झूठ न साच।। (मानस, 1/114)
ऐसा अधम नर कहते हैं जो मोहरूपी पिशाच से ग्रसे हैं। जिनके हृदय में विषयरूपी काई लगी है, वे ही ऐसा कहते हैं। गिरिजा! तूने वेद-असम्मत वाणी कही है, यद्यपि तुम्हारा भाव अच्छा है। तत्पश्चात् उन्होंने उत्तर देना आरम्भ किया तो राम का स्वरूप बताया-
बिषय करन सुर जीव समेता।
सकल एक तें एक सचेता।।
सब कर परम प्रकासक जोई।
राम अनादि अवधपति सोई।। (मानस, 1/116/5-6)
अर्थात् विषय, विषयों को करनेवाली इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा उत्तरोत्तर एक दूसरे के सहयोग से सचेत होते हैं, एक दूसरे के सहयोग से जागृत होते हैं और इन सबको प्रकाश देनेवाली जो मूल सत्ता है, वही है राम। इन सबका जो परम प्रकाशक है वही अवधपति राम हैं। वास्तव में इन्द्रियाँ एवं मन तो चराचर में सर्वत्र पाया जाता है इसीलिए ‘जगत प्रकास्य प्रकासक रामू।’ (मानस, 1/116/7)- जगत् प्रकाश्य है और राम प्रकाशक हैं। वे मायाधीश हैं, ज्ञान और गुण के धाम हैं। राम तो सर्वत्र एक जीवनी शक्ति के रूप में हैं तभी तो पेड़ हरा-भरा है। यही उनका प्रकाश है। गिरिजा को भ्रम हुआ था कि राम भगवान कैसे हो सकते हैं?- इसलिए शंकरजी कहते हैं-
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई।
गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।। (मानस, 1/117/3)
ऐसा भ्रम जिनकी कृपा से मिट जाता है वही कृपालु रघुराई हैं। वह भ्रम जब कभी किसी का मिटा है तो अनुभव से मिटा है। जब कभी किसी ऋषि-महर्षि ने उस भ्रम का निवारण पाया तो अनुभव के द्वारा ही पाया है। महर्षि मार्कण्डेय ने अनुभव में महाप्रलय की लीला देखी और अन्त में प्रलय के बाद भी उस शाश्वत सत्ता को जीवित पाया। उसके स्पर्श के साथ ही महर्षि का भ्रम दूर हो गया। कागभुशुण्डि ने हजारों-लाखों वर्ष तक भगवान के उदर में पर्यटन किया। वहाँ राम-अवतार भी देखा। अपने आश्रम को देखा। विविध रूप में भरतादिक भ्राताओं को देखा-
भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।। (मानस, 7/81 क)
अगणित भुवनों में भटका। सभी शक्तियाँ तो भिन्न-भिन्न रूप में थीं किन्तु राम को दूसरे प्रकार का नहीं देखा। भरत दूसरे प्रकार के थे, लक्ष्मण दूसरे प्रकार के थे, माता कौशल्या दूसरे प्रकार की थीं, लेकिन राम ठीक उसी प्रकार के थे- जैसा बाहर देखा था। वह सदैव एकरस रहनेवाली सत्ता है। सुनने से तो ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि कागभुशुण्डि ने भगवान के पेट के अन्दर प्रवेश कर यह सब देखा; लेकिन नहीं, यह भी एक अनुभव था-
उभय घरी महँ मैं सब देखा।
भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।। (मानस, 7/81/8)
अगणित तो वे नगर देखते रहे, लोक-परलोक देखते रहे, बहुत-सा समय अपने आश्रम में भी बिताया। युग पर युग बीतते गये और अन्त में निर्णय देते हैं, ‘उभय घरी’- दो ही घड़ी में मैंने सब कुछ देखा। सिद्ध है कि वह एक अनुभव था। चिन्तन में आनेवाला, ध्यान में मिलनेवाला, इष्ट से प्रसारित एक ‘रील’ थी। समाधिजन्य एक दृश्य था। ऋतम्भरा प्रज्ञा की अनुभूति थी। जब ऐसा भ्रम होता है कि राम सगुण हैं या निर्गुण हैं? कहाँ पैदा होते हैं? कैसे रहते हैं? ऐसा भ्रम जिस युक्ति से दूर हो जाता है, बस वही राम हैं। ‘जासु कृपाँ अस भ्रम’- जैसा कि तुमको हुआ, ‘मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।।’- अर्थात् विज्ञानरूपी राम।
सोइ सच्चिदानन्द घन रामा।
अज बिज्ञान रूप बल धामा।। (मानस, 7/71/3)
राम कैसे हैं? उनका स्वरूप कैसा है? विज्ञानरूपी उन राम का कार्य-कलाप कैसा है? कैसे वे चलते हैं? कैसे युद्ध कराते हैं? कैसे भक्त के साथ रहते हैं? शंकर जी बताते हैं-
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा।
गहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी।
महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।। (मानस, 1/117/5-8)
वह बिना कान के सुनता है, बिना आँख के देखता है, बिना पैर के चलता है, बिना हाथ के सम्पूर्ण कृत्य करता है। इस प्रकार राम की करनी सब तरह से अलौकिक है। सिद्ध है कि वह अनुभवगम्य है, अर्थात् विज्ञानरूपी राम- ऐसा शंकरजी का निर्णय है।
राम का जन्म भी विचारणीय है-
ब्यापक ब्रह्म निरंजन, निर्गुन बिगत बिनोद।
सो अज प्रेम भगति बस, कौसल्या के गोद।। (मानस, 1/198)
जो कभी व्यक्त नहीं होता, बिना पैरों के चलता है, बिना आँखों के देखता है, बिना शरीर के शरीरधारी है, वही अजन्मा, अव्यक्त, शाश्वत राम प्रेमरूपी भक्ति के द्वारा कौशल्या की गोद में आता है। वस्तुतः प्रेममयी भक्ति का ही दूसरा नाम ‘कौशल्या’ है। अतः ‘भक्तिरूपी कौशल्या’। कोश कहते हैं सम्पत्ति के केन्द्र को। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। उस स्थिर सम्पत्ति का संग्रह भक्ति में है इसलिए उसका नाम कौशल्या है।
इसी क्रम में राम के नामकरण पर भी विचार कीजिए। जब भगवान राम इत्यादि का जन्म हो गया तो दशरथ हर्षोल्लास के साथ गुरु वशिष्ठ के पास पहुँचे कि इनका नामकरण किया जाय। वशिष्ठ ने कहा- इनके नाम अनेक और अनन्त हैं, गिने नहीं जा सकते; किन्तु व्यवहार में सम्बोधन के लिए उन्होंने चारों पुत्रों का क्रमशः नाम दिया और यह भी कहा कि ये साधारण पुत्र नहीं हैं बल्कि वेद के तत्त्व हैं-
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी।
बेद तत्व नृप तव सुत चारी।। (मानस, 1/197/1)
हृदय में विचार करके वशिष्ठ ने नाम रखा और अन्त में निर्णय दिया कि राजन्! ये साधारण पुरुष नहीं हैं। ये चारों सुत वेद के तत्त्व हैं। परमतत्त्व, जो विदित नहीं है, उसको भी विदित करा देनेवाला वेद है, उसके तत्त्व हैं। अब चारों भाइयों का नामकरण देखें-
बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।। (मानस, 1/196/7)
जो विश्व के भरण-पोषण की क्षमता रखते हैं, उनका नाम भरत है। चारों भाइयों में भरण-पोषण की क्षमता यदि किसी में थी तो भरत में थी, इसीलिए उनका नाम भरत पड़ा। किन्तु कार्यक्षेत्र में वैसा लक्षण नहीं पाया जाता, जैसा वशिष्ठजी ने कहा। जब माता कैकेयी के आदेश से राम वनवास के लिए चले गये तो बिलखते हुए भरत राम के पीछे चित्रकूट पहुँचे। लोगों ने भरत से राज्य करने का आग्रह किया; किन्तु भरत ने उसे नहीं स्वीकारा। राम ने कहा- अच्छा, कम से कम चौदह वर्षों तक ही प्रजा का पालन-पोषण करो; किन्तु भरत खड़ाऊँ पर भार छोड़कर नन्दिग्राम की एक कन्दरा में जाकर बैठ गये। चौदह वर्षों तक बाहर ही नहीं निकले। विश्व-पोषण तो गया भाड़ में, मात्र अयोध्या के भरण-पोषण का जहाँ प्रश्न आया, भरत कन्दरा में बैठ गये; उलटकर देखा तक नहीं। संयोग से मंत्री अच्छे और स्वामिभक्त थे अतः व्यवस्था चलती रही। किन्तु नामकरण जिस विशेष गुण के आधार पर हुआ था, व्यवहार में वैसा नहीं पाया गया। दूसरे पुत्र का नामकरण देखें-
जाके सुमिरन तें रिपु नासा।
नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।। (मानस, 1/196/8)
शत्रुओं का नाश करने की क्षमता थी तो एकमात्र शत्रुघ्न में थी। उनके स्मरण मात्र से ही शत्रुओं का नाश हो जाता है इसीलिए तो उनका नाम शत्रुघ्न पड़ा। लेकिन ‘मानस’ के अवलोकन से ज्ञात होता है कि राम लड़े, लक्ष्मण लड़े, आवश्यकता पड़ने पर भरत ने भी एक बाण हनुमान को मारा, लेकिन शत्रुघ्न ने तो एक चुहिया तक नहीं मारी। जबकि नामकरण में, चारों भाइयों में शत्रु-दमन की क्षमता थी तो एकमात्र शत्रुघ्न में थी। हाँ, कुबरी को शत्रुघ्न ने लात अवश्य मारी थी; क्योंकि वह बेचारी घूमकर मुक्का भी नहीं चला सकती थी। शत्रुघ्न ने देखा कि वह कुछ कर नहीं पायेगी फिर भी एक लात पीछे से लगायी, तभी तो कुबड़ पर लगी। यही उनका पराक्रम था; किन्तु कार्यक्षेत्र में ऐसा पाया नहीं जाता। इसी प्रकार लक्ष्मण के नामकरण का आधार देखें-
लच्छन धाम राम प्रिय, सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ट तेहि राखा, लछिमन नाम उदार।। (मानस, 1/197)
जो लक्षणों के धाम हैं, जगत् के आधार हैं, राम के प्रिय हैं; गुरु वशिष्ठ ने उनका नाम लक्ष्मण रखा। वे शुभ लक्षणों के धाम थे। एक भी दुर्गुण नहीं था उनमें, इसीलिए लक्ष्मण कहलाये। जबकि लक्ष्मण महान् क्रोधी थे। क्रोध एक दुर्गुण है। यद्यपि भरत सहृदयता के साथ राम को मनाने जा रहे थे, किन्तु लक्ष्मण उन्हें आते देखकर धनुष उठाकर छलाँग भरने लगे। लक्ष्मण का क्रोधी स्वभाव प्रसिद्ध है। धनुर्भंग, वनवास, किष्किन्धा, लंका सर्वत्र उनका यह स्वरूप दिखायी देता है फिर भी वे लक्षणों के धाम कहे गये। जब सीता चोरी चली गईं, तो ‘लछिमनहूँ यह मरमु न जाना।’ (मानस, 3/23/5) केवट मर्म जान गया था; किन्तु ‘लच्छन धाम’ नहीं जान सके। युद्ध में मेघनाद से सामना होने पर, यह जानते हुए भी कि शत्रु कमजोर नहीं है उसका प्रबल शस्त्र सामने से चला आ रहा है, लक्ष्मण सीना तानकर मूर्च्छित हो जाते हैं। लक्ष्मण एँड़े अवश्य हैं, लेकिन जहाँ तक लक्षण का प्रश्न है, वे कोरे दीखते हैं। लक्षण तो तब होता जब वे शत्रु के इरादों को पहले ही भाँप जाते। ‘कहबि न तात लखन लरिकाई।’ (मानस, 2/151/8)- साथ-साथ पैदा हुए; किन्तु राम के और उनके स्वभाव में कितना अन्तर था। चारों भाइयों में सम्पूर्ण शुभ गुण लक्ष्मण में थे; किन्तु व्यवहार में वैसा नहीं पाया जाता। अब, राम के नामकरण पर दृष्टिपात करें-
जो आनन्द सिन्धु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (मानस, 1/196/5)
वे आनन्द के समुद्र हैं, सुख की राशि हैं, अपनी एक बूँद से त्रैलोक्य को सुपास प्रदान करनेवाले हैं-
सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोकदायक बिश्रामा।। (मानस, 1/196/6)
वे सुख के धाम हैं, इसलिये उनका नाम राम है। वे सम्पूर्ण लोकों को विश्राम प्रदान करनेवाले हैं। राम आनन्द के समुद्र, सुख के धाम तो थे जिन्हें दुःख स्पर्श ही नहीं करता था; लेकिन यदि राम का जीवनवृत्त देखा जाय तो वे सुख-शान्ति से कभी नहीं रहे। बचपन में ही उन्हें विश्वामित्र ले गये। ले जाकर ताड़का से लड़ा दिया। इसके उपरान्त शादी-विवाह हुआ, कुछ सफलता मिली, राजपाट के सुख का समय आया तो मन्थरा गले पड़ गयी। राम को राज्य की जगह चौदह वर्ष का वनवास मिला। वनवास में किसी तरह समय काट रहे थे कि सीता चोरी चली गयी, फिर तो ‘हाय मृगलोचनी! हाय गजगामिनी! हाय सीते! मुझे छोड़कर कहाँ चली गई।’ ‘लता तरु पाती’ से पूछते-बिलखते रहे। नारद को उनकी दशा देखकर महान् पश्चाताप हो रहा था कि मेरे शाप के कारण राम दुःखों का बोझ सहन कर रहे हैं। यह बात अलग है कि राम ने हँसते हुए दुःख झेला, किन्तु थे तो दुःख ही।
राम ने सेना का संगठन किया, रावण को जीता। सीता सहित अवध के सिंहासन पर आसीन हुए, तो एक धोबी ने आक्षेप कर दिया। संयोग से धोबी की पत्नी रात भर किसी के यहाँ उत्सव के कारण रुक गई। धोबी बोला- मैं राम नहीं हूँ जो दूसरों के घर रहनेवाली स्त्री को पुनः अपना लूँ। राम ने ऐसा सुना तो लोकरंजन के लिए सीता का परित्याग करके असह्य दुःख झेला; यद्यपि सीता की निर्दोषिता प्रमाणित थी। वाल्मीकि और लवकुश के प्रयास से जब जनता ने सीता को निर्दोष मान लिया और राम ने सीता से अयोध्या वापस चलने का आग्रह किया तो सीता पृथ्वी में समा गयीं। राम के दुःख की क्या कोई सीमा थी? अन्त में एक बात पर लक्ष्मण सरयू में प्रविष्ट हो गये। राम को इतना कष्ट हुआ कि वे भी सरयू में कूद पड़े। जिसका जीवन ही दुःख से भरा पड़ा हो, वशिष्ठ उसे कहते हैं- ‘सो सुख धाम’ जिन्हें दुःख स्पर्श ही नहीं करता, उनका ‘राम अस नामा। अखिल लोकदायक विश्रामा।’- वे ही सम्पूर्ण लोकों के विश्रामदाता हैं।
इस प्रकार जैसा नामकरण किया गया, वैसा कार्यक्षेत्र में पाया नहीं जाता। क्या वशिष्ठजी ने दक्षिणा के लिए ऐसी प्रशस्ति कर दी अथवा तुलसीदासजी झूठ लिखते थे? नहीं; मानस अक्षरशः सत्य है, एक भी चौपाई गलत नहीं है। लेकिन ‘वस्तु कहीं ढूंढ़े कहीं, कैसे पावै ताहि।’ वह वस्तुस्थिति ही कहीं अन्यत्र है। देखिये, प्रत्येक शास्त्र का निर्माण दो दृष्टियों से होता है- एक तो ऐतिहासिक घटना-क्रम जीवित रखना और दूसरे उस घटित घटना के माध्यम से आध्यात्मिक प्रक्रिया द्वारा परमतत्त्व तक की दूरी तय करा देना।
ऐतिहासिक घटनाओं से हम मर्यादित जीवन की प्रेरणा ग्रहण करते हैं। किन्तु कुशलतापूर्वक जी-खा लेने मात्र से मनुष्य का कल्याण नहीं हो जाता। अतः संसार में जब तक रहें तब तक शिष्टजन अनुमोदित विधि से जीवन-यापन करें, इस दृष्टि से ऐतिहासिक घटनाओं को जीवित रखा जाता है। साथ ही, इस प्रकार जीते-खाते समझ-बूझ काम करने लगे तब उस परमप्रभु के अंक में प्रवेश पाने के लिये आध्यात्मिक विद्या का सृजन मनीषियों ने किया। घटना हुई न होती तो दृष्टान्त कहाँ से बनते। उसी घटना को माध्यम बनाकर ऋषियों ने उस आध्यात्मिक संघर्ष का विस्तार से वर्णन किया, जिसका परिणाम परमशान्ति और परमतत्त्व है।
रामचरित मानस में भी इन्हीं वस्तुओं को छिपाकर लिखा गया है। मानस को मात्र इतिहास मान लेना भयंकर भूल होगी।
‘रामचरित’ का अर्थ है- राम का चरित्र। तो क्या शरीर में या भूखण्डों में जो राम हुए थे, तुलसीदास उनका चरित्र लिखने जा रहे हैं। गोस्वामीजी कहते हैं नहीं, अपितु ‘मानस’ लिख रहे हैं। मानस मन को, अन्तःकरण को कहते हैं। अतः रामचरितमानस का तात्पर्य राम के उस चरित्र से है जो मन के अन्तराल में प्रसारित है। हैं तो सब में किन्तु दिखाई नहीं देते। यहाँ तो रात-दिन काम का चरित्र, लोभ का चरित्र, मोह और छल-छद्म का चरित्र ही दिखायी देता है। राम के चरित्र तो मन में दिखाई ही नहीं देते। हैं सब में। वे जिस प्रकार मन में जागृत होते हैं और जागृत होकर राम तक की दूरी तय कराते हैं वहाँ तक का साधन-क्रम इस मानस में अंकित है।
याद रखें, जो पुस्तक के शीर्षक में होता है, उसी का पट-प्रसार, उसी का विस्तार पंक्तियों में हुआ करता है। रामचरितमानस का आशय राम के उस चरित्र से है जो मन के अन्तराल में प्रसारित है। प्रश्न उठता है कि किस प्रकार प्रसारित है? अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं। एक आसुरी सम्पद्, दूसरी दैवी सम्पद्। आसुरी सम्पत्ति अधोगति एवं नीच योनियों में फेंकनेवाली है और दैवी सम्पद् परमकल्याण करनेवाली होती है।
‘विनयपत्रिका’ में तुलसीदासजी कहते हैं, ‘वपुष ब्रह्माण्ड सुप्रवृत्ति लंका दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी।’ (58)- यह शरीर ही सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड है, जिसमें ‘प्रवृत्ति लंका’- मायिक प्रवृत्ति, शारीरिक अनुरक्ति ही लंका है।
तुलसीदासजी रोचक कहते-कहते कहीं-कहीं यथार्थ का भी संकेत करते चलते हैं। मनरूपी मय दानव ने इस प्रवृत्तिरूपी लंका का निर्माण किया है, जिसमें-
मोह दशमौलि, तद्भ्रात अहंकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी।
लोभ अतिकाय, मत्सर महोदरदुष्ट, क्रोध पापिष्ठ-विबुधान्तकारी।। (विनयपत्रिका, 58)
मोह ही रावण है जो ‘सकल व्याधिन्ह कर मूला’ है, इसीलिए राजा है। इस लंका में क्रोधरूपी कुम्भकर्ण, लोभरूपी नारान्तक, अहंकाररूपी अहिरावण, प्रकृतिरूपी सूर्पणखा हैं और इन्हीं के बीच जीवरूपी विभीषण है जो है तो दुष्टों के बीच, मोह इसका सगा भाई है, किन्तु उसकी दृष्टि सदैव राम पर रहती है। जीवात्मा वास्तव में मोह के कारण फँसा है। मोह के संयोग से ही तो इसका नाम जीव पड़ा। यह जीव अपने परिवार, बाल-बच्चों के भरण-पोषण इत्यादि की चिन्ता में रहता है लेकिन साथ ही इसकी दृष्टि परमात्म-तत्त्व पर भी रहती है।
अभी आश्रम में एक अमेरिकन सज्जन आये थे। हमने पूछा कि इतने व्यस्त अमेरिका में भी क्या लोग भगवान को मानते हैं? वह बोले- ‘‘यह तो ‘नेचुरल’ है। न मानने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता। हाँ, यह बात अलग है कि हम लोग यह नहीं जानते कि किस रास्ते से उन्हें ढूँढ़ा जाय? इसीलिए तो भारत आये हैं।’’
इसी प्रकार यह आसुरी सम्पद् क्रमशः चलकर असंख्य अधोमुखी प्रवृत्तियों का कारण बनती है। युद्ध में सबके मिटने के बाद रावण जब दुर्ग से निकला तो उसके साथ असंख्य सेना थी। सब तो मर गये थे, यह अगणित सेना अभी शेष ही थी। लेकिन है कुछ ऐसा ही। मोहरूपी रावण ही सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है। यदि मूल जीवित है तो शाखाओं और पत्तियों का पुनः हरा-भरा हो जाना स्वाभाविक है। उस मूल में सभी प्रसुप्त हैं; समय पाकर उभड़ेंगे इसीलिये सभी जीवित माने जाते हैं।
दूसरी ओर यह शरीर ही अवध है। इसमें अवध्य स्थिति का संचार है, इसलिये यह अवध कहलाता है। इसमें दस इन्द्रियों का निरोध ही दशरथ है। इसमें भक्तिरूपी कौशल्या, कर्मरूपी कैकेयी, सुमतिरूपी सुमित्रा, मलिन मति मंथरा और ज्ञानरूपी वशिष्ठ हैं। खाना-पीना, उठना-बैठना सब ज्ञान से ही होता है, क्या यही ज्ञान? जी नहीं, ‘वश इष्ट सः वशिष्ठ’- इष्ट को वश में करनेवाली जानकारी ही वशिष्ठ है। यही जानकारी ही सच्चा ज्ञान है। तो भला वह कौन-सी युक्ति-विशेष है जिससे वह इष्ट वश में होता है? वह है श्वासरूपी शृंगी ऋषि। शृंगी ऋषि ने यज्ञ किया। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ (गीता, 10/25)- जप ही यज्ञ है। श्वास-प्रश्वास का यजन ही यज्ञ है, हृदय की विमलता ही हवि है। जहाँ ऐसा यज्ञ हुआ तहाँ भक्तिरूपी कौशल्या की गोद में विज्ञानरूपी राम प्रकट हो जाते हैं। अनुभवी सूत्रपात होने लगता है। साथ ही विवेकरूपी लक्ष्मण, भावरूपी भरत, सत्संगरूपी शत्रुघ्न का प्रादुर्भाव हो जाता है।
साधक के हृदय में जब ये अनहोनी वस्तुएँ जागृत होती हैं तो उसका विश्वास दृढ़ हो जाता है इसीलिए विश्वासरूपी विश्वामित्र का आगमन होता है।
जानें बिनु न होइ परतीती।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।। (मानस, 7/88/7)
जब तक वह जानने में नहीं आता तब तक विश्वास नहीं होता और बिना विश्वास हुए प्रीति नहीं होती, हार्दिक लगाव नहीं होता-
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।
जिमि खगपति जल कै चिकनाई।। (मानस, 7/88/8)
बिना प्रीति के भक्ति दृढ़ नहीं होती। भक्त तो सभी बनते हैं किन्तु वह भक्ति ऐसी ही होती है जैसे जल की चिकनाई। पूरब की हवा चली तो पश्चिम के कोने में चिकनाई इकट्ठी हो गयी और दक्षिण की हवा चली तो चिकनाई उत्तर चली जाती है।
संग-दोषरूपी वायु कभी-कभी न रहने से वह जल पर छायी हुई दिखाई देती है लेकिन यह क्षणिक है। जहाँ कुसंग मिला तहाँ सारी भक्ति किनारे चली जाती है। जब साधक में अनुभव, भाव, विवेक, सत्संग का सूत्रपात होने लगता है तभी इष्ट की सर्वव्यापकता में विश्वास होता है। लोग कहते हैं विश्वास करो, किन्तु करे भी तो कैसे? आँखें मूँदकर विश्वास करोगे तो अन्धविश्वास होगा। जब अनुभवी सूत्रपात मिलने लगता है तहाँ ‘विश्वासरूपी विश्वामित्र’, विश्वास का होना स्वाभाविक है। तब विश्वास के साथ उसी यज्ञ को करने लगे। यज्ञ कोई दूसरा नहीं है। उसी यज्ञ को करने लगे जो पहले करते थे किन्तु अब विश्वास के साथ कर रहे हैं, विश्वामित्र भी साथ ही हैं। तहाँ तर्करूपी ताड़का, स्वभावरूपी सुबाहु, स्वभाव में मैलरूपी मारीच विघ्न डालते हैं किन्तु अनुभव से, विज्ञानरूपी राम द्वारा शान्त हो जाते हैं। फिर ‘अवध हृदय लय सः अहिल्या’ की गति प्राप्त होती है।
यहाँ से दैवी सम्पत्ति का प्रारम्भ है। क्रमशः चलकर दैवी गुण भी अनन्त हो जाते हैं। दैवी सम्पद् का तात्पर्य ब्रह्म आचरण की प्रवृत्ति है-
बानर कटक उमा मैं देखा।
सो मुरुख जो करन चह लेखा।। (मानस, 4/21/1)
भगवान शंकर कहते हैं- उमा, मैंने वानर कटक देखा। वह निपट मूर्ख है जो उसकी गणना करना चाहता है। आज चार अरब ही विश्व की जनसंख्या है फिर भी खाद्य-समस्या विश्वस्तर पर बनी ही हुई है। उस समय भगवान शंकर के शब्दों में, असंख्य वानर थे। वे बुद्धिहीन हैं जो गणना करना चाहते हैं। स्पष्ट है कि यह सेना भी सद्गुणों की है जो मन के अन्तराल में ही है। ब्रह्म आचरणमयी प्रवृत्ति ही वानरी सेना है इसीलिये जब गुरु वशिष्ठ ने नामकरण किया तो स्पष्ट बताया कि मानस के राम हैं। उन्होंने कहा-
बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।। (मानस, 1/196/7)
भाव ही भरत है। ‘भावे विद्यते देवा’- भाव में वह शक्ति है कि परमदेव परमात्मा तक विदित हो जाता है। ‘भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।’ (मानस, 7/92 ख), भगवान अन्य किसी युक्ति से वश में नहीं होते। एकमात्र भाव से ही भगवान वश में होते हैं, जो सुख के निधान और करुणा के धाम हैं। अतः भावरूपी भरत। विश्व में किसी ने किसी का भरण-पोषण किया है, पूर्ण तृप्ति प्रदान की है तो एकमात्र भाव से। जिन-जिन के हृदय में भाव हार्दिक लगाव जागृत हुआ है, इष्ट से सीधा सम्बन्ध जुड़ा है। मनुष्य अपूर्ण है। भौतिक वस्तुओं से, रुपयों-पैसों से मनुष्य पूर्ण नहीं बन जाता। वह तो जब भी पूर्ण होगा, आत्मदर्शन से ही होगा और उस आत्मदर्शन की एकमात्र क्षमता भाव में ही सम्भव है। इन आत्माओं को कभी भी तृप्ति मिली है तो ईश्वर-दर्शन से ही मिली है और वह ईश्वर भाव के वश में है इसलिये भाव ही भरत है। भाव में ही वह क्षमता है जो इन आत्माओं को विश्व में पूर्ण तृप्त कर दे इसीलिये उसका नाम भरत पड़ा। ऐसा नहीं कि आजकल के नेताओं की तरह भरत जनता का पेट भरते। आज तो जिसके पास बैल थे, ट्रैक्टर आ गया है; लेकिन पेट नहीं भरता। उसे दस बसें दे दी जाएँ, पेट खाली ही रहता है। ‘बिड़ला’ की फैक्टरियाँ मिल जायँ, किन्तु तृष्णा तब भी कम नहीं होगी। हाँ, शोषण की भावनाएँ अवश्य बढ़ती जाती हैं। कब किसको तृप्ति मिली? महाबीर, बुद्ध को राज्य भी तृप्ति नहीं दे सका। जब कभी किसी को तृप्ति मिली है तो परमात्मा के अंक में ही मिली है, वही यथार्थ भरण और पूर्ण पोषण है। वह पोषण कैसे मिलेगा? भाव के द्वारा! अतः भाव ही भरत है। यह वेद का तत्त्व है अर्थात् जो तत्त्व विदित नहीं है, अलख-अदृश्य-अव्यक्त है उसे विदित करा देनेवाला तत्त्व है भरत; न कि कोई हाड़, माँस और चमड़ी का भरत रहा होगा।
तदनन्तर शत्रुघ्न का नामकरण करते हैं-
जाके सुमिरन तें रिपु नासा।
नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।। (मानस, 1/196/8)
जिनके सुमिरन से शत्रुओं का नाश होता है, उनका नाम शत्रुघ्न है, ‘वेद प्रकासा’- वेदों का ऐसा निर्णय है। गुरु वशिष्ठ ने उसी निर्णय पर विश्वास किया और स्वयं भी वही निर्णय दिया। वेद और महर्षि दोनों का मत एक है कि शत्रुघ्न के सुमिरन का विधान है। इतना होते हुए भी शत्रुघ्न का सुमिरन कोई नहीं करता। इस वेदाज्ञा और सद्गुरु आज्ञा पर चलनेवाला कोई दिखायी नहीं देता। सुमिरन तो सभी राम का ही करते हैं। ‘शत्रुघ्न-शत्रुघ्न’ जपनेवाला आज तक दिखायी ही नहीं दिया। आपने कहीं सुना है? नहीं, यह है मानस का सत्संगरूपी शत्रुघ्न!
सत्संग दो प्रकार का होता है। एक सत्संग तो वह है जो वाणी से किया जाता है, जो सुनने में आता है, जैसा आप सत्पुरुषों की सभाओं में सुनते हैं। दूसरा सत्संग क्रियात्मक है। वस्तुतः सत् की संगति ही सत्संग है, यथा-
सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार।
नित्यानित्य विवेकिया, लीजे बात विचार।।
सत्य और शाश्वत तो वह आत्मा ही है, उसका संग ही सत्संग है। यह सत्संग ध्यान, समाधि, चिन्तन, भजन के द्वारा होता है। यह अन्तरंग सत्संग केवल मन से होता है इसलिए सुमिरन से ही सत्य की संगति सम्भव है। मन सब ओर से सिमटकर उस आत्म-चिन्तन में रत हो जाय, श्वास की संगत करने लगे, उस आत्मा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगे, बस उसी दिन से सत्य की संगति- सत्संग का प्रारम्भ हो जाता है। चिन्तन ज्यों-ज्यों सूक्ष्म होता जायेगा, मन सब ओर से सिमटकर इष्ट में केन्द्रित होता जायेगा, त्यों-त्यों शत्रुओं का नाश होता जायेगा। मन का सुमिरन और इष्ट जब तद्रूप हो जाते हैं तब मायिक शत्रुओं का उन्मूलन हो जाता है। अजेय शत्रु तो हमारे भीतर ही हैं- ‘महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर।’ (मानस 6/80 क) काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि वास्तविक शत्रुओं को महापुरुषों ने शोध निकाला है। बाहरी लड़ाई तो मोह का द्वन्द्व मात्र है-
जलचर-बृन्द जाल अन्तरगत, होत सिमिटि इक पासा।
एकहि एक खात लालचबस, नहिं देखत निज नासा।। (विनय0, 92 )
वास्तव में चराचर के शत्रुओं का उन्मूलन, मोहरूपी रावण इत्यादि सम्पूर्ण शत्रुओं का समूल नाश सत्संग के माध्यम से ही हुआ है। राम तो अनुभव से सूचित करनेवाले यंत्र का नाम मात्र है। सुमिरन और चिन्तन से ही मायिक शत्रुओं के नाश का विधान है। सुमिरन-चिन्तन पर ही सत्संग का उतार-चढ़ाव निर्भर है इसीलिए सत्संगरूपी शत्रुघ्न। ‘जाके सुमिरन तें रिपु नासा’- जिसके स्मरण से काम, क्रोध, मोहादि शत्रुओं का शमन हो जाता है, ‘नाम सत्रुहन बेद प्रकासा’- उसका नाम शत्रुघ्न है। राजन्! यह वेद तत्त्व है। जो परमात्मा विदित नहीं है उसको विदित करा देनेवाला तत्त्व है, न कि पाँच भौतिक पिण्डधारी कोई शत्रुघ्न थे। इसी प्रकार-
लच्छन धाम राम प्रिय, सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ट तेहि राखा, लछिमन नाम उदार।। (मानस, 1/197)
जो सम्पूर्ण लक्षणों के धाम हैं, राम के प्रिय हैं, ‘सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ट तेहि राखा, लछिमन नाम उदार।।’ विवेकरूपी लक्ष्मण! सत्य क्या है? असत्य क्या है?- इसकी जानकारी और जानकारी के पश्चात् सत्य पर आरूढ़ रहने की क्षमता का नाम विवेक है। सत्य और शाश्वत तो एकमात्र ईश्वर है, आत्मा है। उस पर आरूढ़ होने की क्षमता जिसमें आ गई, वही लक्ष्मण है, वही लक्षणों का धाम है-
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।
जाकें पद सरोज रति होई।। (मानस, 7/48/8)
उल्लेखनीय है कि उत्तरकाण्ड का यह निर्णय भी वशिष्ठजी का ही है। वही लक्षणों का धाम है, वही राम का प्रिय है। सत्य वस्तु आत्मा पर ही जिसकी दृष्टि होती है, भगवान को वही प्रिय होता है-
पुरुष नपुसंक नारि वा, जीव चराचर कोइ।
सर्वभाव भज कपट तजि, मोहिं परम प्रिय सोइ।। (मानस, 7/87 क)
पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी अथवा नर हो, कपट का त्याग करके सर्वतोभावेन जो भी मुझे भजता है, वही मुझे परमप्रिय है। इस प्रकार परमसत्य परमात्मा की ओर अग्रसर रहने की क्षमता का नाम ही ‘लक्ष्मण’ है, ‘विवेक’ है। जिसमें यह क्षमताहोगी, वही राम को प्रिय होगा, वही सकल जगत् का आधार है। इष्ट या लक्ष्य का मनन ही लक्ष्मण है। मनन करते-करते मन इष्ट के तद्रूप होकर ईश्वरमयी स्थिति प्राप्त कर लेता है जो सम्पूर्ण जगत् का आधार है। राजन्! यह अविदित परब्रह्म को विदित करा देनेवाला तत्त्व है, लक्षण है, न कि कोई व्यक्ति-विशेष।
जो आनन्द सिन्धु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (मानस, 1/196/5)
जो आनन्द के समुद्र हैं, सुख की राशि हैं, अपनी एक बूँद से त्रैलोक्य को सुपास प्रदान करनेवाले हैं, वे राम हैं। कभी-कभी साधक घबड़ाने लगता है, वहाँ भगवान एक बूँद फेंक देते हैं। कहते हैं तुम चिन्ता न करो, तुम्हें मुक्ति दे देंगे। बस एक बूँद मिला यद्यपि मुक्ति अभी अलग है किन्तु मात्र इतने आश्वासन से, जो राम द्वारा मिलता है, साधक त्रैलोक्य में सुपास पा जाता है, उसे भय नहीं रह जाता। वह पुनः साधना में लग जाता है। फिर घबराहट हुई तो बोल देते हैं, ‘तुम्हारी साधना ठीक है, बस थोड़ी-सी वृत्ति रुकी हुई है।’ सन्तोष प्रदान कर दिया, एक बूँद दे दिया। इसी प्रकार अलौकिक अनुभूतियों के द्वारा, अंग-स्पन्दन के द्वारा, ध्यानजनित दृश्यों के द्वारा, स्वप्न के द्वारा, आकाशवाणी के द्वारा ईश्वरीय संकेत का नाम ‘राम’ है। यह राम के अनुभूति की प्रारंभिक अवस्था है। राम बिना मुँह के बोलते हैं, ध्यान में बोलते हैं, हृदय एवं मस्तिष्क में बोलते हैं, मन में बोलते हैं- उस बोली का नाम राम है। वह बिना पैरों के चलते हैं, साधक के साथ-साथ चलते हैं, उनका नाम राम है। वह विज्ञान, अनुभवी उपलब्धि ही राम है। ‘भव’ कहते हैं संसार को और ‘अनु’ अतीत को कहते हैं अर्थात् भव से बाहर करनेवाली जागृति-विशेष (अनुभव) का नाम ही राम है। वह है उस परमात्मा की आवाज का हृदय में प्रस्फुटन! वह सन्देश भीतर सुनायी पड़ता है, दिखायी पड़ता है। इष्ट जब साधक की आत्मा से अभिन्न होकर जागृत हो जायँ, हृदय में दिखाई पड़ने लगें, पथ प्रदर्शन करने लगें, वही राम हैं। वह स्वयं ‘आनन्द सिन्धु’ और ‘सुखराशि’ हैं। ‘सीकर तें त्रैलोक सुपासी’ एक बूँद भी जिस साधक को देता है, उसे त्रैलोक्य में सुपास दे देता है, निर्भय बना देता है। ‘सो सुख धाम राम अस नामा’- वह सुख का धाम है उसका नाम राम है। ‘अखिल लोक दायक बिश्रामा’- सम्पूर्ण लोक को विश्राम देनेवाला वही एक स्थल है। यही अनुभव चलते-चलते जब ईश्वर के समीप की अवस्था आ जाती है तो अनुभवगम्य स्थिति ही मिल जाती है। यह अनुभव साधक भक्त को अपने में विलय कर लेता है। यजनपूर्ण स्वर की सरयू है। राम सरयू में विलीन हो जाते हैं। राम कहीं चले नहीं जाते बल्कि श्वासरूपी सरयू में प्रविष्ट हो जाते हैं, हर श्वास के साथ रहते हैं। अवधवासी भी, साथ ही, सरयू में लीन हो जाते हैं अर्थात् अवध्य स्थिति, अजर-अमर, शाश्वत स्वरूप साधक को प्राप्त हो जाता है। यही राम की पराकाष्ठा है।
प्रकृति में स्थित जीवात्मा प्रकृति से परे परमात्मा में लय हो जाय, उससे मिल जाय यही तो ‘योग’ है। एक में मिलने का नाम ‘योग’ है। दूध में जल मिल जाता है, शरीर से वस्त्र मिल जाता है, टार्च आपके हाथ से मिलती है, यह योग नहीं है। यह तो मैटर क्षेत्र की वस्तुएँ ही परस्पर टकरा रही हैं। पदार्थ पदार्थ से टकरा रहा है। योग तो दो भिन्न तत्त्वों का होता है। प्रकृति में स्थित जीवात्मा क्रमशः उत्थान करते-करते प्रकृति से भिन्न परमात्मा से मेल कर ले, वही योग है। प्रकृति नश्वर है, पुरुष शाश्वत है। दोनों दो भिन्न तत्त्च हैं। उनके मिलन और विलय का नाम ‘योग’ है। मिलन के साथ-साथ प्रकृति, जो कमजोर है, विलय हो जाती है और जो शाश्वत है वही शेष बचा रहता है। यही ‘योगरूपी जनकपुर’ है।
योगरूपी जनकपुर में ध्यानरूपी धनुष है। चित्तचढ़रूपी चाप है। चित्त के चांचल्य को तोड़ना ही चाप का तोड़ना है। जिस चित्त की चंचलता टूट जाती है ध्यान उसी से होता है।
नाथ संभु धनु भंजनिहारा।
होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। (मानस, 1/270/1)
भगवन्! वह स्वयंभू धनु, स्वयं को उपलब्ध करानेवाला ध्यान, उस ध्यान में आनेवाली चंचलता को समाप्त करनेवाला विरला ही कोई आपका दास होगा। किसका दास? किसने पूछा था? एक महापुरुष ने पूछा था कि किसने तोड़ा, तो ‘होइहि केउ एक दास तुम्हारा।’ चित्त चढ़रूपी चाप – जब चित्त के चांचल्य का क्रम टूट जाता है तहाँ वही स्थिति ध्यान में बँध जाती है। ध्यान की योग्यता आ जाती है। जब चित्त चलायमान ही नहीं तो ध्यान ही तो लगेगा। तुरन्त शक्तिरूपी सीता मिलती है। सीता कौन थी? राम की शक्ति थी। तो शक्तिरूपी सीता! जो अनादि शक्ति है वही अनुभवों (राम) में संचारित हो जाती है। विज्ञानरूपी राम! विज्ञान और अनुभव एक दूसरे के पर्याय हैं। पहले तो अनुभव आते हैं किन्तु वे क्षीण होते हैं। चार-छः महीने किसी महापुरुष का साथ करें तो कुछ-न-कुछ देखने लगेंगे। परन्तु प्रारम्भ में अनुभव अनियमित होते हैं। जान-बूझकर गलती करने पर अनुभवों का संचार बन्द भी हो जाता है। किन्तु जब चित्त के चांचल्य का निरोध हो जाता है तहाँ शक्तिरूपी सीता मिल जाती है। अनुभवों में शक्ति का संचार हो जाता है। फिर अनुभव में जो कुछ मिलेगा वह अकाट्य होगा। ऐसा अनुभव इष्ट का मौलिक निर्णय होगा।
फिर तो ‘जागृतिरूपी जयमाला’। साधक जब पहले भजन करने बैठता है तो निद्रा आ जाती है किन्तु चित्त की चंचलता टूटने पर, अनुभवों में शक्तिरूपी सीता का संयोग होने पर निद्रा का वेग मन्द पड़ जाता है। वह इस मोहनिशा से सचेत हो जाता है, नींद नहीं आती; क्योंकि लक्ष्य आगे दिखायी देने लग जाता है।इस योगरूपी जनकपुर में भरत को माण्डवी मिली। भाव पहले खंडित होता रहता है। आज भाव है तो कल अभाव में परिणत हो जाएगा किन्तु चित्त की चंचलता समाप्त होते ही, अनुभवों में गति आ जाने पर माण्डवी मिलती है। पहले जो भाव खण्डित हो जाता था, वही भाव अब मण्डित हो जाता है। फिर टूटता नहीं, कभी नहीं टूटता।
विवेकरूपी लक्ष्मण को उनकी शक्ति उर्मिला मिली। पहले विवेक बौद्धिक स्तर पर होता है। क्या सत्य है, क्या असत्य है?- बुद्धि के द्वारा विचार कर निर्णय करना पड़ता है। विचार के द्वारा विवेकी बनना पड़ता है। किन्तु जब चित्त के चांचल्य की समाप्ति से ध्यान बँध जाता है तहाँ फिर ‘उरमिला’- विवेक हृदय से मिलने लगता है। बौद्धिक निर्णय लेने की आवश्यकता शिथिल पड़ जाती है। सत्य और असत्य का निर्णय इष्ट ही हृदय में कर देते हैं।
सत्संगरूपी शत्रुघ्न को उनकी शक्ति ‘श्रुतिकीर्ति’ मिली। सत् का संग सुमिरन से होता है। सुमिरन करते तो सभी हैं किन्तु इष्ट के चरणों में सुरति नहीं लगती। भजन करते समय शरीर अवश्य बैठा दिखायी देता है; किन्तु मन अन्यत्र भटकता रहता है।
जब तक इष्ट के चरणों में सुरत न लग जाय, उनका रूप हृदय में धारावाही दिखायी न पड़ने लगे तब तक सत्संग नहीं होता। योगेश्वर श्रीकृष्ण का निर्देश है कि, अर्जुन! काया, ग्रीवा और शिर को एक सीध में रखकर, दृढ़ होकर नासिका के अग्रभाग को देखता हुआ, अन्य किसी भी ओर न देखता हुआ मुझमें चित्त लगावे और मेरे सिवा कुछ भी न देखे। (गीता, अध्याय 6) प्रारम्भ में तो ऐसा नहीं होता, किन्तु जब चित्त के चांचल्य का क्रम टूट जाता है तहाँ ‘सुरत कृत्य’- जो सुरत लगायी जाती थी उसमें कृतार्थता आ जाती है, सफलता मिल जाती है। इसीलिए श्रुतिकीर्ति के बिना शत्रुघ्न अपूर्ण हैं। सत्य की संगति करते-करते जब सत् और सुरत पूर्णतः तद्रूप हो जायेंगे तो मायिक विकारों का, चराचर के शुभ-अशुभ संस्कारों का समूलोच्छेद हो जायेगा। इस प्रकार भाव, विवेक, सत्संग, विज्ञान सभी एक दूसरे के पूरक हैं, सहयोगी हैं। साधना के समस्त सोपानों से क्रमशः पार होकर साधक अनुभवगम्य स्थिति ही प्राप्त कर लेता है। सर्वत्र राममयी स्थिति ही हो जाती है। यही राम का वास्तविक स्वरूप है।
~स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी परमहंस।©
विनम्र शुभकामनाओं सहित,
~मृत्युञ्जयानन्द।
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